SCHOOL- वृद्ध मित्र बुजुर्गों के सम्मानपूर्ण जीवन की दिशा में एक प्रयास

SCHOOL- वृद्ध मित्र

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स्वास्थ्य और गरिमा प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं। हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ, भावनात्मक सहयोग और सम्मान तथा सुरक्षा के साथ जीवन जीने के अवसर प्राप्त होने चाहिए। ये अधिकार किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि, आयु या निवास स्थान या भौगोलिक परिस्थिती के आधार पर प्रभावित नहीं होने चाहिए। ऐसे समावेशी और संवेदनशील समुदायों का निर्माण आवश्यक है, जहाँ कोई भी व्यक्ति उपेक्षित, अनसुना या असहाय न रह जाए। ईसी उद्देश्य को लेके वर्ष 2007 में सोसाइटी ऑफ कम्युनिटी हेल्थ ओरिएंटेड ऑपरेशनल लिंक्स (SCHOOL) की स्थापना हुई

स्थापना के बाद से ही SCHOOL ने समुदाय-आधारित और मानवीय दृष्टिकोण को अपने कार्य का केंद्र बनाया। संगठन का विश्वास रहा है कि स्वास्थ्य केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, भावनात्मक और मानवीय सहयोग से भी जुड़ा हुआ है। इसी सोच के साथ SCHOOL ने समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर वंचित और उपेक्षित समुदायों तक पहुँचकर उनके जीवन की गुणवत्ता सुधारने का निरंतर प्रयास किया है।

दृढ़ विश्वास से प्रेरित एक मिशन

इसी सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ SCHOOL ने उन लोगों तक पहुँचने का कार्य शुरू किया, जो अक्सर विकास और सेवाओं की मुख्यधारा से दूर रह जाते हैं। पिछले लगभग दो दशकों में संगठन ने झारखंड में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और टीकाकरण, छत्तीसगढ़ में तपेदिक की जाँच एवं देखभाल, स्वास्थ्य सुविधा गुणवत्ता सुधार तथा सामुदायिक विकास जैसे अनेक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। समुदाय-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं और मानवीय सहयोग को केंद्र में रखते हुए SCHOOL ने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ निरंतर जुड़कर कार्य किया है। संगठन का प्रयास केवल स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में विश्वास, जागरूकता और सम्मान की भावना को मजबूत करना भी रहा है।

इन्हीं प्रयासों के दौरान वर्ष 2018 में पुणे की झुग्गी बस्तियों में कार्य करते हुए टीम ने महसूस किया कि बुजुर्ग आबादी समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों में से एक है। कई बुजुर्ग अकेले रहते थे, नियमित स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुँच नहीं थी और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ भी उन्हें नहीं मिल पा रहा था। बढ़ती उम्र के साथ वे केवल शारीरिक समस्याओं ही नहीं, बल्कि भावनात्मक अकेलेपन, असुरक्षा और सामाजिक अलगाव का भी सामना कर रहे थे। कई मामलों में परिवार के सदस्य रोजगार या अन्य कारणों से दूर रहते थे, जिससे दैनिक जीवन की छोटी-छोटी आवश्यकताएँ भी बुजुर्गों के लिए चुनौती बन जाती थीं।

इन परिस्थितियों ने टीम के सामने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया —
“एक बुजुर्ग व्यक्ति अपने घर और समुदाय में सम्मान और आत्मसम्मान के साथ जीवन कैसे जी सकता है?”

इसी प्रश्न ने “वृद्ध मित्र” कार्यक्रम की नींव रखी। संस्था के प्रमुख डॉ. बेनजीर पाटील के नेतृत्व में पुणे की दो बस्तियों में रहने वाले 620 बुजुर्गों के साथ एक पायलट पहल शुरू की गई, जिसे “वृद्ध मित्र” कार्यक्रम नाम दिया गया। इस पहल का उद्देश्य केवल स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि बुजुर्गों को भावनात्मक सहयोग, नियमित संवाद, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना और समुदाय के भीतर सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना भी था।

धीरे-धीरे इस कार्यक्रम ने हजारों बुजुर्गों के जीवन में आशा, आत्मीयता और आत्मसम्मान का संचार किया। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि आने वाले कुछ वर्षों में यह पहल देश के सबसे प्रभावी सामुदायिक बुजुर्ग देखभाल मॉडलों में से एक बन जाएगी।

छोटे प्रयास से राष्ट्रीय मॉडल तक

सात वर्षों बाद यह पायलट पहल एक ऐसे व्यापक कार्यक्रम में विकसित हो चुकी है, जो आज पुणे, मुंबई, भोपाल, ग्वालियर, दिल्ली, वाराणसी, लखनऊ, मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र भितरवार ब्लॉक तथा राजस्थान के खैरथल-तिजारा सहित नौ भौगोलिक क्षेत्रों में 60,000 से अधिक बुजुर्गों तक पहुँच बना चुकी है। यह विस्तार केवल संख्या बढ़ाने की दौड़ का परिणाम नहीं था, बल्कि मूल्यों और गुणवत्ता पर आधारित एक सोच-समझकर किया गया प्रयास था। SCHOOL ने हमेशा नए क्षेत्रों में तभी कार्य शुरू किया, जब वहाँ कार्यक्रम की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रणाली, स्थानीय भागीदारी और सामुदायिक सहयोग मजबूत रूप से तैयार हो सके। केवल आँकड़ों को बढ़ाने के बजाय संस्था ने सेवा की गुणवत्ता, मानवीय संबंधों और समुदाय के विश्वास को प्राथमिकता दी।

“इस पहल ने एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव तब आया, जब वर्ष 2024 में भारत सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने SCHOOL के साथ औपचारिक साझेदारी की। यह केवल एक संस्थागत सहयोग नहीं था, बल्कि “वृद्ध मित्र” मॉडल की राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति का प्रतीक भी था। पहली बार भारत सरकार ने “वृद्ध मित्र” को केवल किसी एक संस्था के कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि देशभर में अपनाए और दोहराए जा सकने वाले एक प्रभावी सामुदायिक बुजुर्ग देखभाल मॉडल के रूप में मान्यता दी।“

2025: जब पहचान ने परिवर्तन का रूप लिया —-

यदि वर्ष 2024 “वृद्ध मित्र” को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने का वर्ष था, तो 2025 उस मान्यता को ठोस दिशा और संरचनात्मक परिवर्तन में बदलने का वर्ष बना। SAHAJ राष्ट्रीय परामर्श में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, नीति आयोग, WHO India, UNFPA, IIHMR Delhi तथा Central Health Education Bureau जैसे प्रमुख संस्थानों के प्रतिनिधियों ने सामुदायिक आधारित बुजुर्ग देखभाल को राष्ट्रीय स्तर पर कैसे मजबूत किया जाए, इस विषय पर गंभीर चर्चा की। इस महत्त्वपूर्ण संवाद में SCHOOL केवल सहभागी नहीं था, बल्कि उसे आगे बढ़ाने वाली प्रमुख संस्थाओं में से एक था।

इसी वर्ष SCHOOL ने सार्वजनिक अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए समर्पित जेरियाट्रिक यूनिट्स को और मजबूत किया, जहाँ शहरी गरीब बुजुर्गों को निःशुल्क फिजियोथेरेपी, दंत चिकित्सा तथा विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएँ और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई जा रही हैं। साथ ही भोपाल, ग्वालियर, लखनऊ और वाराणसी में “वृद्ध मित्र केंद्र” स्थापित किए गए — ऐसे सामुदायिक स्थान, जहाँ बुजुर्ग सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़ सकते हैं, मनोरंजन और सामुदायिक गतिविधियों में भाग ले सकते हैं, और सबसे महत्त्वपूर्ण, अपनापन और साथ का अनुभव कर सकते हैं। ऐसे समय में जब बुजुर्गों में अकेलापन एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी समस्या बन चुका है, यह पहल विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने SCHOOL को मध्य प्रदेश के लिए “रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर” के रूप में भी मान्यता दी, जिससे बुजुर्ग देखभाल के क्षेत्र में प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और क्षमता निर्माण में संगठन की भूमिका और सशक्त हुई। इसके साथ ही SCHOOL ने “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन जेरियाट्रिक केयर एंड जेरोंटोलॉजी” की अवधारणा विकसित की है — एक ऐसा राष्ट्रीय संस्थान, जो प्रशिक्षण, अनुसंधान और क्षमता निर्माण के माध्यम से भारत में बुजुर्ग देखभाल के अगले अध्याय को दिशा देने का प्रयास करेगा।

कार्य के केंद्र में मानवीय दृष्टिकोण

“वृद्ध मित्र” नाम का अर्थ ही है — “बुजुर्गों का मित्र”, और SCHOOL ने इस भावना को अपने कार्य के केंद्र में रखा है। इस कार्यक्रम के अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले कार्यकर्ता केवल कर्मचारी नहीं हैं; वे बुजुर्गों के पड़ोसी, विश्वासपात्र, सहारा और उनके अधिकारों के पक्षधर भी हैं।“

वे केवल सेवाएँ प्रदान नहीं करते, बल्कि नियमित संवाद, आत्मीयता और मानवीय जुड़ाव के माध्यम से बुजुर्गों के जीवन में भरोसा और अपनापन भी लौटाते हैं।

कार्यक्रम से जुड़े प्रत्येक बुजुर्ग का प्रारंभिक मूल्यांकन WHO द्वारा निर्धारित जीवन-गुणवत्ता के छह प्रमुख आयामों के आधार पर किया जाता है — शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक एवं भावनात्मक स्थिति, आत्मनिर्भरता का स्तर, सामाजिक संबंध, पर्यावरणीय परिस्थितियाँ तथा आध्यात्मिक आवश्यकताएँ। इस मूल्यांकन के आधार पर प्रत्येक बुजुर्ग के लिए एक व्यक्तिगत देखभाल योजना (Individual Care Plan) तैयार की जाती है, जिसकी नियमित अंतराल पर समीक्षा और अद्यतन किया जाता है, ताकि उनकी बदलती आवश्यकताओं के अनुसार निरंतर सहयोग सुनिश्चित किया जा सके।

इस देखभाल प्रणाली को प्रभावी बनाने में तकनीक की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कार्यक्रम से जुड़े प्रत्येक बुजुर्ग का पंजीकरण SCHOOL के डिजिटल एप्लिकेशन और “सेविंग लाइफ चेकलिस्ट” के माध्यम से किया जाता है, जिससे उनकी आवश्यकताओं और स्वास्थ्य स्थिति की नियमित निगरानी संभव हो पाती है।

COVID-19 महामारी के दौरान शुरू की गई टेली-कंसल्टेशन सेवा अब कार्यक्रम का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। उदाहरण के लिए, भितरवार के ग्रामीण क्षेत्र में घर पर रहने वाला कोई बुजुर्ग अब अपने कम्युनिटी ऑफिसर की सहायता से वीडियो कॉल के माध्यम से पुणे में बैठे डॉक्टर से परामर्श ले सकता है, और आवश्यक दवाइयाँ उसके घर तक पहुँचाई जाती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से लंबे समय तक दूर रहे बुजुर्गों के लिए यह बदलाव केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में एक गहरा परिवर्तन साबित हुआ है।

लेकिन SCHOOL यह भी स्पष्ट रूप से समझता है कि तकनीक क्या कर सकती है और क्या नहीं। संस्था तकनीक को केवल एक सहायक माध्यम मानती है, न कि देखभाल का केंद्र। संगठन के अनुसार किसी भी सेवा की वास्तविक गुणवत्ता अंततः उस व्यक्ति पर निर्भर करती है, जो बुजुर्ग के घर के दरवाज़े पर पहुँचकर संवेदनशीलता, सम्मान और आत्मीयता के साथ उनका साथ देता है। बाकी सभी व्यवस्थाएँ और तकनीकें केवल उस मानवीय जुड़ाव को मजबूत बनाने का माध्यम हैं।

मानवीय क्षमता से सामाजिक परिवर्तन तक

वृद्ध मित्र कार्यक्रम का स्वरूप जितना सोच-समझकर बनाया गया है, उतनीही सोच-समझ और दृष्टिकोण से  SCHOOL ने वृद्ध मित्र मतलब इस कार्यक्रम की सेवाये बुजूर्गोंतक पहुचानेवाले लोगों को तैयार करने और सशक्त बनाने मे दिखाई है। “वृद्ध मित्र अकादमी” विशेष रूप से वंचित, आर्थिक रूप से कमजोर और कम प्रतिनिधित्व वाले समुदायों से लोगों को जोड़ती है। वृद्ध मित्र कार्यक्रम में कार्यरत कम्युनिटी ऑफिसर केवल कर्मचारी नहीं हैं। वे समुदाय के विश्वसनीय साथी, मार्गदर्शक और सहयोगी हैं। आज कार्यक्रम से जुड़े अनेक कम्युनिटी ऑफिसर निम्न-आय वर्ग की महिलाएँ हैं, जिन्होंने “वृद्ध मित्र” के माध्यम से न केवल आजीविका प्राप्त की है, बल्कि एक नई पेशेवर पहचान और आत्मविश्वास भी पाया है।

यह केवल समावेशन का प्रयास नहीं, बल्कि अनुभव पर आधारित एक सोच है — क्योंकि संवेदनशीलता और संघर्ष को सबसे बेहतर वही समझ सकता है, जिसने स्वयं उसे जिया हो।

कार्यक्रम के आँकड़े भी इस प्रतिबद्धता को स्पष्ट करते हैं — “वृद्ध मित्र” से जुड़े 63% बुजुर्ग महिलाएँ हैं। यह केवल वृद्धावस्था की जनसांख्यिकीय वास्तविकता को नहीं दर्शाता, बल्कि इस तथ्य को भी स्वीकार करता है कि भारत में वृद्धावस्था के दौरान गरीबी, उपेक्षा और असुरक्षा का बोझ महिलाओं पर अधिक पड़ता है। इसलिए महिलाओं के लिए बनाए गए कई कार्यक्रमों का नेतृत्व भी महिलाएँ ही कर रही हैं, क्योंकि समुदाय के भीतर उनकी समझ, संवेदनशीलता और विश्वास इस कार्य को और अधिक प्रभावी बनाते हैं।

एकल प्रयास नहीं, सामूहिक सहयोग का नेटवर्क

SCHOOL किसी एक स्वतंत्र या सीमित इकाई की तरह कार्य नहीं करता, बल्कि सहयोग और साझेदारी पर आधारित एक व्यापक नेटवर्क के रूप में काम करता है। “वृद्ध मित्र नेटवर्क” के माध्यम से 200 से अधिक साझेदार संस्थाएँ जुड़ी हुई हैं, जो कानूनी सहायता, पोषण सहयोग, फिजियोथेरेपी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ और अन्य आवश्यक सहयोग प्रदान करती हैं — ऐसे क्षेत्र जिनमें वे वर्षों से विशेषज्ञता विकसित कर चुकी हैं।

कम्युनिटी ऑफिसर स्थानीय सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों, आंगनवाड़ी सेवाओं और पंचायतों के साथ मिलकर कार्य करते हैं, जबकि जेरियाट्रिक यूनिट्स सार्वजनिक अस्पतालों के भीतर संचालित की जाती हैं। इस पहल को आगे बढ़ाने में सरकार, कॉर्पोरेट संस्थानों और परोपकारी संगठनों का भी महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा है। टाटा ट्रस्ट्स, HCL Foundation, Yardi और SBI Capital Markets जैसी संस्थाएँ इस साझा प्रयास का हिस्सा हैं।

वर्षों के सहयोग और साझेदारी के अनुभव से SCHOOL ने यह सीखा है कि किसी भी सफल साझेदारी की सबसे महत्त्वपूर्ण नींव केवल साझा लक्ष्य नहीं, बल्कि साझा मूल्य होते हैं। जब कोई संस्था बुजुर्ग व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को अपने कार्य का केंद्र मानती है, तब सहयोग मजबूत और दीर्घकालिक बनता है। लेकिन जब यह संवेदनशीलता और मूल्य-आधारित सोच अनुपस्थित होती है, तब संसाधनों से समृद्ध साझेदारियाँ भी लंबे समय तक टिक नहीं पातीं।

पहचान मिली, पर संसाधनों की कमी अब भी बाकी

कार्यक्रम का विस्तार SCHOOL के लिए उपलब्धियों के साथ-साथ नई चुनौतियाँ भी लेकर आता है। कार्यक्रम के विस्तार के साथ उसकी जटिलताएँ भी बढ़ीं। अलग-अलग राज्यों तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में देखभाल की गुणवत्ता को एक समान बनाए रखना केवल नियमों से संभव नहीं था, बल्कि ऐसे संवेदनशील और प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता थी, जो विभिन्न परिस्थितियों में सही निर्णय ले सकें और कार्यक्रम की भावना को गहराई से समझते हों।

इसीलिए SCHOOL ने अपने कम्युनिटी ऑफिसर्स के प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और नियमित पर्यवेक्षण पर विशेष ध्यान दिया है। संस्था का मानना है कि किसी भी कार्यक्रम की वास्तविक ताकत उसकी कार्यप्रणाली से अधिक उन लोगों में होती है, जो उसे जमीन पर मानवीय संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाते हैं।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती नीति स्तर पर मिली मान्यता और वास्तविक सार्वजनिक संसाधनों के बीच की दूरी है। वर्ष 2025 में “वृद्ध मित्र” को सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, नीति आयोग की वरिष्ठ नागरिक देखभाल सुधार संबंधी रिपोर्ट तथा विभिन्न स्तरों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से व्यापक सराहना और समर्थन मिला। लेकिन इस मान्यता को दीर्घकालिक और पर्याप्त सार्वजनिक वित्तीय सहयोग में बदलना अभी भी एक निरंतर प्रक्रिया है।

इसी दिशा में SCHOOL राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर लगातार संवाद और वकालत कर रहा है। विशेष रूप से “वृद्ध मित्र टूलकिट” इस प्रयास का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम बनकर उभरी है, जो सामुदायिक बुजुर्ग देखभाल मॉडल को समझाने, अपनाने और विस्तार देने में प्रभावी भूमिका निभा रही है।

वास्तविक बदलाव का मापन

SCHOOL अपनी सफलता को केवल संख्या या पहुँच के आधार पर नहीं मापता, बल्कि WHO के WHOQOL-OLD ढाँचे के अनुसार बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता में आए वास्तविक सुधार के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।“

हालांकि संस्था यह भी मानती है कि केवल आँकड़े यह बताते हैं कि कितने लोगों तक पहुँचा गया, लेकिन कहानियाँ यह बताती हैं कि उस प्रयास ने वास्तव में किसी के जीवन में कितना बदलाव लाया।

वाराणसी के एक 65 वर्षीय बुजुर्ग की कहानी, जिसकी मोतियाबिंद सर्जरी कार्यक्रम की सहायता से संभव हो सकी और जिसने वर्षों बाद फिर से स्पष्ट देखना शुरू किया; या पुणे की वृद्ध महिला की कहानी, जो लंबे समय तक अकेलेपन में जी रही थीं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़ने और नियमित सहयोग मिलने के बाद उन्होंने आर्थिक और भावनात्मक स्थिरता प्राप्त की — ऐसे अनुभव ही इस कार्यक्रम के वास्तविक प्रभाव को दर्शाते हैं। यही कहानियाँ और आँकड़े मिलकर संस्था को अपने उद्देश्य और संवेदनशीलता के प्रति ईमानदार बनाए रखते हैं।

भविष्य की राह

SCHOOL की दीर्घकालिक दृष्टि महत्वाकांक्षी है — भारत में ऐसा “एज-फ्रेंडली” समाज विकसित करना, जहाँ प्रत्येक बुजुर्ग व्यक्ति को, उसकी आय या भौगोलिक स्थिति चाहे जो भी हो, सम्मान, देखभाल और आत्मीय सहयोग प्राप्त हो सके। संस्था यह भली-भाँति समझती है कि इस लक्ष्य को वह अकेले हासिल नहीं कर सकती।

लेकिन SCHOOL ने यह अवश्य साबित किया है कि ऐसा मॉडल संभव है। संस्था ने इसके लिए ठोस अनुभव और प्रमाण तैयार किए हैं, प्रशिक्षित कार्यबल विकसित किया है, और ऐसी नीतिगत संरचना के लिए लगातार वकालत की है, जिससे इस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया और आगे बढ़ाया जा सके।

संस्था का एक ठोस और दीर्घकालिक लक्ष्य यह भी है कि भारत की स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के भीतर समुदाय-आधारित बुजुर्ग देखभाल कर्मियों का एक राष्ट्रीय तंत्र विकसित किया जाए — ऐसा तंत्र जो प्रशिक्षित, प्रमाणित, सुव्यवस्थित और पर्याप्त संसाधनों से समर्थित हो। SCHOOL का मानना है कि बुजुर्ग देखभाल को प्रभावी और टिकाऊ बनाने के लिए इसे केवल सामाजिक पहल नहीं, बल्कि एक संगठित और मान्यता प्राप्त व्यवस्था के रूप में विकसित करना आवश्यक है।

जैसे-जैसे भारत में “सिल्वर इकॉनॉमी” का विस्तार हो रहा है और बुजुर्गों की स्वास्थ्य, आवास, पोषण तथा अन्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नए सामाजिक और उद्यमशील प्रयास सामने आ रहे हैं, SCHOOL का मानना है कि सामाजिक उद्यमों को ऐसे टिकाऊ मार्ग विकसित करने पर विशेष ध्यान देना होगा, जो इन आवश्यकताओं को सम्मानजनक और प्रभावी तरीके से पूरा कर सकें।

संस्था का विश्वास है कि इस प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन भारत में बुजुर्ग देखभाल को अलग-अलग कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय एक मजबूत और समन्वित व्यवस्था में बदल सकता है। इसी दिशा में SCHOOL बुजुर्गों के लिए मानव संसाधन से संबंधित आगामी राष्ट्रीय परामर्श के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए आवश्यक रूपरेखा और नीति ढाँचा विकसित करने में सक्रिय भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। SCHOOL अब अपने कार्य और अनुभवों को वैश्विक मंचों तक भी पहुँचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ग्लासगो में आयोजित Global Ageing Conference में सहभागिता, अंतरराष्ट्रीय दीर्घायु (Longevity) शोध में योगदान तथा Indian Institute of Public Health जैसी संस्थाओं के साथ साझेदारी ने इस दिशा को और मजबूत किया है।

वर्षों के विश्वसनीय जमीनी कार्य और समुदाय-आधारित अनुभवों के कारण संस्था ने इन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी एक पहचान और विश्वसनीय स्थान बनाया है। अब SCHOOL इस अवसर का उपयोग भारत में बुजुर्ग देखभाल के अनुभवों, चुनौतियों और समाधानों को व्यापक स्तर पर साझा करने और नीति निर्माण में सार्थक योगदान देने के लिए करना चाहता है।

“पहले विश्वास बनाइए, फिर विस्तार कीजिए।”

SCHOOL के नेतृत्व द्वारा दी गई यह सरल-सी सलाह किसी भी संस्था के लिए टिकाऊ सामाजिक परिवर्तन की दिशा दिखाती है।“

SCHOOL ने अपने कार्य का विस्तार तेज़ी से नहीं, बल्कि ईमानदारी, धैर्य और संवेदनशीलता के साथ किया है। संस्था हमेशा इस विश्वास के साथ आगे बढ़ी है कि जिन लोगों के जीवन तक उसका कार्य पहुँचता है, वे केवल सेवाओं के नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और गरिमापूर्ण देखभाल के हकदार हैं — और उन्हें इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं होना चाहिए।

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